एक नंबर... दो बसें! आरटीओ की चेकिंग में खुला ‘डबल नंबर’ का राज

एक नंबर... दो बसें! आरटीओ की चेकिंग में खुला ‘डबल नंबर’ का राज

MP10P0603 सागर और बेगमगंज में एक ही दिन जब्त, दोनों राहतगढ़ से संचालित, अब चेसिस-इंजन नंबर बताएंगे असली वाहन, विभाग की निगरानी पर भी सवाल



सागर से न्यूज: 22 सितंबर,2026
सागर। परिवहन विभाग की चेकिंग में सामने आया MP10P0603 का मामला अब सिर्फ एक नंबर की दो बसों तक सीमित नहीं रहा। सागर में इस नंबर की यात्री बस जब्त हुई, वहीं उसी दिन बेगमगंज में भी इसी नंबर की दूसरी यात्री बस पकड़ी गई। खास बात यह है कि दोनों बसें राहतगढ़ से संचालित मिलीं। एक राहतगढ़-सागर तो दूसरी राहतगढ़-बेगमगंज रूट पर चल रही थी। अब परिवहन विभाग खुद जांच कर रहा है कि दोनों में से वास्तविक MP10P0603 कौन-सा वाहन है। मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि एक ही पंजीयन नंबर की दो बसें सड़क तक पहुंचीं कैसे? यदि दोनों में से किसी एक पर नंबर गलत था तो उसकी पहचान पहले की जांच में क्यों नहीं हुई? और यदि दोनों के दस्तावेजों में यही नंबर दर्ज मिला तो रिकॉर्ड किस स्तर पर बना या सत्यापित हुआ? इसका जवाब दोनों बसों के चेसिस नंबर, इंजन नंबर, आरसी, परमिट और फिटनेस रिकॉर्ड के मिलान से ही सामने आएगा। विभाग ने 22 सितंबर को भोपाल रोड और शहरी क्षेत्र में 32 वाहनों की जांच की थी। इसी कार्रवाई में यह बस पकड़ी गई। लेकिन उसी दिन बेगमगंज में इसी नंबर की दूसरी बस मिलने से सवाल यह भी है कि क्या इससे पहले इन बसों की जांच हुई थी? यदि हुई थी तो वाहन की पहचान किस आधार पर की गई और अगर नहीं हुई तो नियमित निगरानी कितनी प्रभावी थी? राहतगढ़ कनेक्शन भी जांच का अहम बिंदु है। दोनों बसें एक ही क्षेत्र से संचालित थीं, लेकिन अलग-अलग रूट पर चल रही थीं। इसलिए जांच में दोनों वाहनों के परमिट, फिटनेस, टैक्स, बीमा और पिछले चालान का रिकॉर्ड सामने लाना जरूरी होगा। इससे पता चलेगा कि मामला केवल नंबर प्लेट का है या दस्तावेजी रिकॉर्ड में भी कोई विरोधाभास है। इसी कार्रवाई में MP15PA0252 स्कूल बस बच्चों को लेकर बिना परमिट और फिटनेस चलती मिली। पांच ऑटो भी बिना लाइसेंस, परमिट और फिटनेस के मिले। पहले जब्त तीन यात्री बसों और एक स्कूल बस से 55 हजार रुपए जुर्माना वसूले जाने की बात विभाग ने कही है। कार्रवाई के आंकड़े यह बताते हैं कि चेकिंग चल रही है, लेकिन सवाल यह है कि इतने वाहनों की नियमित निगरानी के बावजूद एक ही नंबर की दो बसें पहले क्यों नहीं पकड़ में आईं। मामले में आरटीओ के आसपास सक्रिय बिचौलिया तंत्र की भूमिका की जांच की मांग उठना भी स्वाभाविक है, लेकिन फिलहाल किसी दलाल, अधिकारी या वाहन मालिक की मिलीभगत का प्रमाण सामने नहीं है। इसलिए जांच का सही सवाल यह है कि क्या पंजीयन, परमिट या फिटनेस की प्रक्रिया में किसी बिचौलिए की भूमिका रही और क्या दोनों वाहनों के दस्तावेज किसी एक नेटवर्क के जरिए तैयार या संचालित हुए। अब विभाग के सामने सिर्फ यह तय करने की चुनौती नहीं है कि MP10P0603 की असली बस कौन-सी है। उसे यह भी बताना होगा कि दूसरी बस उसी नंबर के साथ सड़क पर कैसे चल रही थी और विभागीय सत्यापन व्यवस्था ने इसे पहले क्यों नहीं पकड़ा। चेसिस-इंजन नंबर, पंजीयन रिकॉर्ड और परमिट की जांच से ही इस ‘डबल नंबर’ की पूरी कहानी सामने आएगी।

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