कागज पर करोड़ों का रखरखाव, जमीन पर जर्जर सड़कें डॉ हरिसिंह गौर केंद्रीय विवि में विकास की दो तस्वीरें : नई परियोजनाओं के बीच बारिश में जलभराव, पुराने भवन और सफाई व्यवस्था पर सवाल, विद्यार्थियों ने 7 दिन का दिया अल्टीमेटम
कागज पर करोड़ों का रखरखाव, जमीन पर जर्जर सड़कें
डॉ हरिसिंह गौर केंद्रीय विवि में विकास की दो तस्वीरें : नई परियोजनाओं के बीच बारिश में जलभराव, पुराने भवन और सफाई व्यवस्था पर सवाल, विद्यार्थियों ने 7 दिन का दिया अल्टीमेटम
सागर से न्यूज: 22 अगस्त,2026 (शनिवार)
सागर। डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय में विकास की तस्वीर जितनी चमकदार दिखाई देती है, परिसर की बुनियादी सुविधाओं की तस्वीर उतनी ही सवाल खड़े करती है। एक तरफ नई और बड़ी परियोजनाओं की तैयारी चल रही है, दूसरी तरफ विद्यार्थी जर्जर सड़कों, बारिश में जलभराव, पुरानी-क्षतिग्रस्त इमारतों और सफाई व्यवस्था जैसी समस्याओं को लेकर प्रशासन के सामने पहुंच रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब विश्वविद्यालय के दस्तावेजों में सड़क, भवन, जलापूर्ति और अन्य सिविल कार्यों के रखरखाव के लिए करोड़ों रुपए तक की कार्ययोजना मौजूद है, तो जमीन पर वही व्यवस्थाएं शिकायत का विषय क्यों बनी हुई हैं।
यह सवाल अब इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि गौर यूथ फोरम की विश्वविद्यालय इकाई ने कुलपति और कुलसचिव को ज्ञापन सौंपकर इन्हीं समस्याओं के समाधान की मांग की है। संगठन ने प्रशासन को सात दिन का समय दिया है। सात दिन में उचित कार्रवाई नहीं होने पर विद्यार्थियों के हित में आंदोलन की चेतावनी दी गई है। जानकारी के अनुसार विश्वविद्यालय के उपलब्ध आधिकारिक दस्तावेजों की पड़ताल बताती है कि रखरखाव कोई नया मुद्दा नहीं है। अप्रैल 2025 में विश्वविद्यालय ने मौजूदा भवनों की मरम्मत, रखरखाव, नवीनीकरण और रेट्रोफिटिंग के साथ मौजूदा सड़कों, सड़क चौड़ीकरण, पुलिया, पार्किंग, रास्तों, गैरेज सहित अन्य सिविल कार्यों के लिए प्रक्रिया शुरू की थी। इसी दस्तावेज में जलापूर्ति, पाइपलाइन, प्लंबिंग और सैनिटेशन से जुड़े रखरखाव कार्य भी शामिल थे। इन कार्यों के लिए अनुमानित राशि 3 करोड़ रुपए तक, फंड की उपलब्धता के अधीन रखी गई थी। यहीं से सवाल और गंभीर हो जाता है। यदि सड़क, भवन और जल व्यवस्था के रखरखाव के लिए इतनी बड़ी कार्ययोजना तैयार की गई थी तो अब तक उसका कितना हिस्सा जमीन पर उतरा? कौन से काम पूरे हुए और कौन से अभी लंबित हैं? जिन स्थानों को मरम्मत की जरूरत थी, क्या उनका दोबारा निरीक्षण हुआ? इन सवालों का स्पष्ट जवाब सामने आना अभी बाकी है। बारिश में सामने आती है व्यवस्था की असली तस्वीर। गौर यूथ फोरम ने परिसर की जर्जर सड़कों और बारिश के दौरान होने वाले जलभराव को प्रमुख मुद्दा बनाया है। विद्यार्थियों का कहना है कि बारिश में पानी जमा होने से आवागमन प्रभावित होता है और खराब सड़कों के कारण परेशानी और बढ़ जाती है। किसी बड़े विश्वविद्यालय परिसर में जलभराव केवल मौसम की समस्या नहीं है। यह सड़क की स्थिति और जल निकासी व्यवस्था दोनों की परीक्षा है। यदि एक ही समस्या बार-बार सामने आती है तो स्थायी समाधान को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। पुरानी और क्षतिग्रस्त इमारतों की मरम्मत की मांग भी इसी कड़ी का हिस्सा है। विश्वविद्यालय की पुरानी इमारतें संस्थान की पहचान और इतिहास से जुड़ी हैं, लेकिन उनका नियमित रखरखाव भी उतना ही जरूरी है। भवन की छत, दीवार, जल रिसाव, विद्युत व्यवस्था और संरचनात्मक स्थिति का समय-समय पर निरीक्षण होना चाहिए। विद्यार्थियों की मांग है कि ऐसे भवनों को चिन्हित कर प्राथमिकता के आधार पर मरम्मत कराई जाए। विश्वविद्यालय में नए भवनों और बड़ी परियोजनाओं की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता। मई 2025 में विश्वविद्यालय ने कई बड़ी परियोजनाओं के लिए प्रोजेक्ट मैनेजमेंट कंसल्टेंसी की प्रक्रिया भी शुरू की थी। इनमें इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी भवन, हॉस्पिटैलिटी एवं मैनेजमेंट से जुड़े भवन, 1000 सीटर छात्रावास, हेल्थ सेंटर, आईटी सेंटर और मल्टीपर्पज कन्वेंशन सेंटर जैसी परियोजनाएं शामिल थीं। लेकिन विद्यार्थियों का सवाल यह है कि नए निर्माण के साथ पुराने ढांचे को संभालने की जिम्मेदारी भी बराबर निभाई जा रही है या नहीं। यही इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है। विकास केवल नई इमारत खड़ी करने का नाम नहीं है। जिस सड़क से विद्यार्थी रोज गुजरता है, जिस भवन में कक्षा लगती है, जिस रास्ते से बारिश में आवागमन होता है और जिस परिसर में रोज हजारों विद्यार्थी रहते-चलते हैं, उसकी स्थिति भी विकास का पैमाना है। सफाई व्यवस्था को लेकर भी विद्यार्थियों ने प्रशासन का ध्यान खींचा है। ज्ञापन में परिसर की नियमित साफ-सफाई के साथ छात्र-छात्राओं के शौचालयों की तत्काल सफाई और आवश्यक मरम्मत की मांग रखी गई है। हालांकि विद्यार्थियों की शिकायत का दायरा केवल शौचालयों तक सीमित नहीं है। मूल मुद्दा पूरे परिसर की रखरखाव व्यवस्था का है। अब सवाल सिर्फ ज्ञापन का नहीं, जवाबदेही का है। प्रशासन को यह बताना होगा कि पिछले वर्षों में रखरखाव के लिए जारी किए गए कार्यों की वर्तमान स्थिति क्या है। 2025 में प्रस्तावित कार्यों में से कितने पूरे हुए, कितने लंबित हैं और जिन कार्यों पर खर्च हुआ, उनकी गुणवत्ता की निगरानी किस स्तर पर हुई। यदि जलभराव की समस्या लगातार सामने आ रही है तो इसके स्थायी समाधान के लिए क्या तकनीकी योजना बनाई गई है। गौर यूथ फोरम ने सात दिन का अल्टीमेटम देकर अब प्रशासन के सामने समयसीमा भी तय कर दी है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विश्वविद्यालय इन शिकायतों पर केवल आश्वासन देता है या मौके पर काम भी शुरू होता है। क्योंकि इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल यही है कि कागज पर रखरखाव की योजनाएं और जमीन पर विद्यार्थियों की शिकायतों के बीच आखिर इतनी दूरी क्यों है? यदि प्रशासन इस दूरी को पाटने में सफल होता है तो यह केवल एक संगठन की मांग का समाधान नहीं होगा, बल्कि विश्वविद्यालय की रोजमर्रा की व्यवस्था में सुधार होगा। लेकिन यदि सात दिन बाद भी स्थिति जस की तस रहती है तो विद्यार्थियों का आंदोलन इस मुद्दे को और बड़ा बना सकता है। ज्ञापन सौंपने के दौरान गौर यूथ फोरम के विश्वविद्यालय क्षेत्र अध्यक्ष भरत सोनी, उपाध्यक्ष पवन दुबे, प्रांजल जोगीनाथ, अभिषेक पटेल, शौर्य जैन, रमाकांत नामदेव, अभिनेंद्र ठाकुर, आदिक उपाध्याय, ध्रुव द्विवेदी, अभिषेक सुधीर, मोहित, कमलेश, दीपक, मोहम्मद कैफ, अभिषेक यादव, विवेक प्रताप, नमन सेन एवं आदित्य सहित अन्य विद्यार्थी और पदाधिकारी मौजूद रहे।

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